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“ताडोबा की ‘चंदा’ और ‘चांदनी’ के स्थानांतरण का स्थानीयों ने किया विरोध; क्या ‘सह्याद्री’ बाघ पुनर्वास अभियान पर पड़ेगा असर?”

चंद्रपुर: ताडोबा की प्रसिद्ध बाघिनें ‘चंदा’ और ‘चांदनी’ के सह्याद्री स्थानांतरण पर स्थानीय विरोध, बाघ पुनर्वास अभियान पर अनिश्चितता

चंद्रपुर जिले में बाघों की बढ़ती संख्या और मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि के बीच, वन विभाग ने सह्याद्री टाइगर रिज़र्व में प्रजननक्षम बाघिनों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से ताडोबा के दो प्रमुख बाघिनों—‘चंदा’ और ‘चांदनी’—को स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है। लेकिन इस कदम ने क्षेत्रीय गाइडों, जिप्सी चालकों और स्थानीय समुदाय में भारी विरोध उत्पन्न कर दिया है, जिससे सह्याद्री में बाघ पुनर्वास अभियान पर सवाल खड़े हो गए हैं।

ताडोबा की स्थायी निवासी: ‘चंदा’ और ‘चांदनी’

‘चंदा’ और ‘चांदनी’, ताडोबा टाइगर रिज़र्व के प्रसिद्ध जोड़े झरनी और छोटा मटका की संतानें हैं। इन दोनों बाघिनों को अपनी ताकत और आत्मविश्वास के लिए जाना जाता है, और ताडोबा में पर्यटकों के बीच इनकी विशेष पहचान बन गई है। वे फिलहाल अलिझंजा, नवेगांव और निमढेला क्षेत्रों में रहती हैं, जहां उनका स्थानांतरण इस समय मुख्य विवाद का केंद्र बन गया है।

गर्भवती बाघिनों के स्थानांतरण का खतरा

हालांकि दोनों बाघिनें हाल ही में प्रजननक्षम हुई हैं, ऐसा अनुमान है कि वे गर्भवती भी हो सकती हैं। ऐसे में उनका स्थानांतरण न केवल उनके लिए बल्कि उनके आने वाले शावकों के जीवन के लिए भी खतरे का कारण बन सकता है। इस स्थिति को लेकर स्थानीय लोग चिंतित हैं, क्योंकि उनका मानना है कि गर्भवती बाघिनों का स्थानांतरण उनके और उनके शावकों के लिए बहुत जोखिम भरा हो सकता है।

स्थानीयों के विरोध के कारण

स्थानीय समुदाय के विरोध के कई कारण हैं:

  1. जन्मभूमि से जुड़ाव: चंदा और चांदनी का जन्म ताडोबा में हुआ है और वे यहीं स्थायी रूप से बस चुकी हैं। इन बाघिनों का स्थानांतरण उनके लिए और उनके समर्थकों के लिए भावनात्मक रूप से कठिन है।
  2. संघर्षरहित सहअस्तित्व: इन बाघिनों ने कभी भी मानव या पालतू पशु पर हमला नहीं किया, जिससे इलाके में मानव-वन्यजीव संघर्ष का कोई बड़ा मुद्दा नहीं खड़ा हुआ है। स्थानीय समुदाय का मानना है कि इन बाघिनों के रहते हुए, उनकी सुरक्षा और पर्यटन व्यवसाय में कोई बड़ा खतरा नहीं है।
  3. आजीविका पर असर: इन बाघिनों के कारण 104 परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है, जिनमें गाइड, जिप्सी चालक और पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोग शामिल हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन बाघिनों को हटाने से न केवल उनके रोजगार पर असर पड़ेगा, बल्कि पर्यटन क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी धक्का लगेगा।
  4. प्राकृतिक आकर्षण: ताडोबा में आने वाले पर्यटक भी इन बाघिनों को यहीं देखने की इच्छा रखते हैं, और उनका मानना है कि ‘चंदा’ और ‘चांदनी’ ताडोबा का प्रमुख आकर्षण हैं।

वन विभाग का पक्ष

वन विभाग का कहना है कि सह्याद्री टाइगर रिज़र्व में बाघों की संख्या में वृद्धि और जैव विविधता का संतुलन बनाए रखने के लिए यह स्थानांतरण आवश्यक है। विभाग का मानना है कि यह कदम बाघों के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर जब सह्याद्री में प्रजननक्षम बाघिनों की कमी है।

क्या होगा भविष्य?

स्थानीय विरोध और वन विभाग के निर्णय के बीच, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ‘चंदा’ और ‘चांदनी’ को ताडोबा से सह्याद्री भेजा जाएगा या फिर उनकी स्थिति में बदलाव आएगा। फिलहाल यह मामला जलती बहस का विषय बना हुआ है, और दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती सामने है।

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