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एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास धीमे, स्टाफ की भारी कमी बनी बड़ी बाधा

नई दिल्ली। देश की राजधानी और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण से लड़ाई कमज़ोर पड़ती दिख रही है — और इसकी बड़ी वजह है संसाधनों की कमी, खासतौर पर प्रशिक्षित मानव संसाधन की। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) समेत एनसीआर के अन्य राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड गंभीर स्टाफ संकट से जूझ रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में स्वीकृत पदों की तुलना में नियुक्त कर्मियों की संख्या बेहद कम है। इस कमी के चलते निगरानी, विश्लेषण और प्रवर्तन जैसे महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

तकनीकी विशेषज्ञों की भारी कमी

विशेषज्ञों की कमी के कारण न केवल मॉनिटरिंग में देरी हो रही है, बल्कि प्रदूषण की रोकथाम और नीतियों के क्रियान्वयन पर भी असर पड़ रहा है। कई रिपोर्टों में सामने आया है कि सैंपलिंग, डेटा विश्लेषण और साइट निरीक्षण जैसे कार्यों के लिए आवश्यक तकनीकी कर्मियों की भारी कमी है।

प्रभावित हो रही नीतियों की प्रभावशीलता

दिल्ली में हर साल सर्दियों में वायु प्रदूषण चरम पर पहुंच जाता है, ऐसे में नियंत्रण बोर्डों की भूमिका बेहद अहम होती है। लेकिन जब उनके पास पर्याप्त स्टाफ ही नहीं है, तो नीतियां कागज़ों तक सीमित रह जाती हैं। स्थिति यह है कि कई बोर्डों को आउटसोर्स स्टाफ पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे जवाबदेही और गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं।

आवश्यक है तात्कालिक हस्तक्षेप

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इन संस्थाओं को मानव संसाधन और तकनीकी क्षमता से सशक्त नहीं करतीं, तो एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण महज एक दिखावा बनकर रह जाएगा।

 

 

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